स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय। Swami Vivekanand Biography in Hindi

नमस्कार दोस्तों, आज हम बात करने वाले हैं युवाओं के आदर्श, महापुरुष स्वामी विवेकानंद के बारे में जो वेदांत के प्रभावशाली एवं विख्यात गुरु थे तथा उन्होंने ही रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। 1893 को शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में भारत की ओर से विवेकानंद जी ने सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व कर ऐसी शानदार प्रस्तुति दी कि पूरी दुनिया में भारत और विवेकानंद का नाम प्रसिद्ध हो गया,

उन्होंने इस सम्मेलन में “मेरे प्यारे भाइयों और बहनों” शब्दों से अपने भाषण की शुरुआत की तथा इन शब्दों से उन्होंने सभी का दिल जीत कर अपने भाषण को पूरा किया और सभी श्रोताओं पर अपनी शब्द मोहिनी डाल दी। तो चलिए दोस्तों आज हम भारत के महापुरुष, युवाओ के आदर्श तथा वेदांत के महान ज्ञाता स्वामी विवेकानंद (नरेंद्र दत्त) के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त करते है, विवेकानंद के बारे में विस्तार से जानने के लिए हमारे लेख को अंत तक पुरा पढ़ ।

स्वामी विवेकानंद की सामान्य जीवनी

  • जन्म नाम – नरेंद्रनाथ दत्त
  • प्रसिद्ध नाम – स्वामी विवेकानंद
  • जन्म दिनांक – 12 जनवरी 1863
  • जन्म स्थान – कोलकाता
  • पिता – विश्वनाथ दत्त
  • माता – भुवनेश्वरी देवी
  • भाई-बहन – 9
  • गुरु – श्री रामकृष्ण परमहंस
  • मृत्यु – 4 जुलाई 1902
  • मृत्यु स्थान – बेलूर, पश्चिम बंगाल

नरेंद्र का जन्म तथा परिवार (childhood of swami vivekanand)

नरेंद्र का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में विश्वनाथ दत्त के घर पर हुआ उनकी माता का नाम भुवनेश्वरी देवी था। वे कुल 9 भाई बहन थे तथा काफी गरीबी में उनका बचपन बीता उनका जन्म/वास्तविक नाम नरेंद्रनाथ दत्त था तथा बाद में वे महापुरुष स्वामी विवेकानंद के नाम से प्रसिद्ध हो गए।

उनके पिता कोलकाता हाई कोर्ट में एटोनि जनरल थे एवं माता धार्मिक विचारों वाली कुशल गृहिणी थी जिन्होंने रामायण, गीता, महाभारत, जैसे कई धार्मिक ग्रंथों को पढ़कर ज्ञान प्राप्त किया। नरेंद्र का जन्म कुलीन उदार परिवार में पश्चिम बंगाल के कोलकाता शहर में हुआ

उनके दादाजी का नाम दुर्गादत्त था जो कि फारसी एवं संस्कृत के विद्वान थे तथा दुर्गादत्त जी ने मात्र 25 वर्ष की उम्र में ही सांसारिक मोह को त्याग कर सन्यास ग्रहण कर लिया विवेकानंद जी को अब तक नरेंद्र नाम से ही जाना जाता था। (स्वामी विवेकानंद का परिवार)

नरेंद्र बचपन से इतने नटखट थे कि उनकी माता उनकी शरारतों से परेशान होकर कहा करती की “मैंने भगवान शिव से एक पुत्र मांगा लेकिन उन्होंने पुत्र के भेष में शैतान दे दिया”, नरेंद्र नटखट तो थे ही और साथ में काफी प्रबल बुद्धि के मानव थे उनके सामने एक बार जो आ जाता वह उन्हें जीवन पर्यंत याद रहता;

एक बार नजर के सामने से गुजरी हुई चीज वे कभी नहीं भूलते ‘कई किताबें उन्हें कंठस्थ याद थी’। उनकी मां धार्मिक प्रवृत्ति की थी अतः वे नरेंद्र को धर्म तथा भगवान के प्रति आस्था बढ़ाने को प्रेरित करती उनकी इस प्रेरणा का इतना गहरा असर होता कि कई बार नरेंद्र अपने घर पर ही ध्यान में इतने तल्लीन हो जाते की आस पास का कोई ज्ञान ही नहीं रहता था।

(स्वामी विवेकानंद का बचपन) नरेंद्र को बचपन से ही माता-पिता से बेहद अच्छे संस्कार तथा परिवेश मिला जिसकी सीख से उन्होंने जीवन में कई मुकाम बड़ी आसानी से प्राप्त कर लिए तथा अपने बचपन के संस्कारों से ही वे आज भी पूरे देश में जाने जाते हैं।

नरेंद्रनाथ दत्त की शिक्षा (education of swami vivekanand)

ईश्वर चंद्र विद्यासागर के मेट्रोपोलिटन संस्थान में 1871 को दाखिल करवाया गया परंतु वे वहां तीसरी कक्षा तक ही पढ़ सके उसके बाद वे अपने परिवार के साथ रायपुर चले गए 1879 में वे पुनः कोलकाता आ गए तथा प्रेसीडेंसी कॉलेज की एंट्रेंस परीक्षा में प्रथम स्थान लाने वाले पहले विद्यार्थी थे।

नरेंद्र ने ललित कला की परीक्षा 1881 में पास की उसके बाद कला विषय में 1884 में स्नातक पूर्ण कर BA की परीक्षा को उत्तीर्ण कर दिया। (स्वामी विवेकानंद की पढ़ाई) BA उत्तीर्ण करने के साथ ही उन्होंने वकालत की पढ़ाई भी शुरू कर दी थी अपनी कुशाग्र बुद्धि तथा तेज दिमाग की वजह से उन्हें एक विद्यालय में दाखिला मिला जहां पर प्रबल बुद्धि का प्रदर्शन करते हुए 3 वर्ष का कोर्स मात्र 1 वर्ष में ही पूर्ण कर लिया ।

उन्हें इतिहास, कला, साहित्य, धर्म, सामाजिक विज्ञान, दर्शन शास्त्र, आदि पढ़ना पसंद है तथा हिंदू धर्म ग्रंथ, वेद, भागवत गीता, पुराण, रामायण, महाभारत आदि पढ़ना भी काफी रोचक लगता है। उन्होंने जनरल असेंबली इंस्टीट्यूशन से यूरोपीय इतिहास का अध्ययन कर शिक्षा प्राप्त की है।

वे स्पेंसर की पुस्तक ‘एजुकेशन’ से इतने प्रभावित हुए कि उसका बंगाली में अनुवाद भी कर लिया (swami vivekanand biography in hindi) खेल तथा व्यायाम में भाग लेने के साथ ही उन्हें धार्मिक पुस्तकें पढ़ना काफी पसंद था। पश्चिम दर्शनशास्त्र के साथ ही बंगाली साहित्य एवं संस्कृत ग्रंथों को बड़े चाव से पढ़ा ; बचपन से ही वे काफी तेज बुद्धि के बालक थे। उन्होंने सर्वप्रथम अपनी सोच को विकसित किया तथा उसके बाद उन्होंने कई राह भटके, अटके लोगों को नई सोच से सीधा रास्ता दिखाया है।

रामकृष्ण परमहंस से मुलाकात

नरेंद्र बेहद जिज्ञासु प्रवृत्ति के थे उन्हें हर बात को जानने की इच्छा रहती और वे अपने गुरु तथा माता-पिता से तरह-तरह के सवाल पूछा करते हैं। एक बार उन्होंने महर्षि देवेंद्रनाथ से प्रश्न पूछा कि ‘क्या आपने ईश्वर/भगवान को देखा है?’ नरेंद्र के इस सवाल से महर्षि जी को आश्चर्य में डाल दिया और उन्होंने इस सवाल का उत्तर जानने तथा

तीव्र जिज्ञासा को कम करने के लिए रामकृष्ण परमहंस से मिलने की सलाह दी (स्वामी विवेकानंद के गुरु) जब 1882 में नरेंद्र रामकृष्ण परमहंस से मिले तो इतने प्रसन्न हुए और एक अद्भुत आनंद को महसूस करने लगे उन्होंने रामकृष्ण परमहंस को अपना गुरु बना कर उनके बताए रास्ते पर चलने की ठान ली

वे अपने गुरु को ही भगवान मानकर उनकी सेवा भक्ति करते रहते । सन 1885 में उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस कैंसर की जानलेवा बीमारी की चपेट में आ गए इस दौरान नरेंद्र तथा उनके मित्रगणों ने गुरु जी की काफी सेवा की और 1886 में रामकृष्ण परमहंस का देवलोक गमन हो गया।

गुरु की मृत्यु के पश्चात वराहनगर में रामकृष्ण संघ की स्थापना नरेंद्र ने करवाई तथा इसका नाम बाद में रामकृष्ण मठ हो गया (कैसे बने नरेंद्र से स्वामी विवेकानंद) रामकृष्ण संघ/मठ की स्थापना के पश्चात ब्रह्मचर्य तथा त्याग का व्रत लेकर नरेंद्र ने सन्यासी जीवन जीना प्रारंभ कर दिया और नरेंद्र नाथ से स्वामी विवेकानंद बन गए।

पैदल भारत भ्रमण

मात्र 25 वर्ष की उम्र में ब्रह्मचार्य तथा त्याग का व्रत लेकर सन्यासी जीवन ग्रहण किया और भारत भ्रमण के लिए पैदल यात्रा शुरू कर दी। यात्रा के दौरान वे गरीब की झोपड़ी से लेकर बड़े-बड़े महलों में भी रुके तथा विभिन्न क्षेत्र व उनके रीति-रिवाज तक की जानकारी ली। वे अयोध्या, आगरा, वृंदावन, वाराणसी, और कई स्थानों पर रहे;

इस यात्रा के दौरान उन्हें जातिगत भेदभाव, बाल विवाह, तथा और कई कुरीतियों के बारे में पता चला तथा उन कुरीतियों को जड़ से मिटाने के कई प्रयास भी किए। (स्वामी विवेकानंद की पैदल यात्रा) विवेकानंद जी ने 23 दिसंबर 1892 को कन्याकुमारी पहुंचकर 3 दिनों तक गंभीर समाधि ली तथा उसके पश्चात वे पुनः पैदल यात्रा के लिए रवाना हुए यात्रा के दौरान वे राजस्थान गए

और वहां पर आबूरोड में अपने गुरु भाई स्वामी दयानंद जी एवं स्वामी ब्रह्मानंद जी से मिलकर अपनी यात्रा के दौरान महसूस हुई वेदना प्रकट की, विवेकानंद गरीबों के दुख व गरीबी से काफी दुखी थे और उनकी पैदल यात्रा पूर्ण करने के पश्चात वे अमेरिका चले गए। (स्वामी विवेकानंद का भारत भ्रमण)

अमेरिका जाकर उन्होंने कुछ ऐसा कर दिखाया कि पुरे विश्व में भारत की जो धुंधली छवि थी वह चमक उठी और पूरे विश्व में भारत को उसकी संस्कृति तथा स्वामी विवेकानंद के नाम से पहचाना जाने लगा।

1893 – विश्व धर्म सम्मेलन “शिकागो भाषण”

अपनी प्रथम पैदल भारत भ्रमण की यात्रा पूर्ण करने के बाद 1893 मे भारत का नेतृत्व करते हुए अमेरिका में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में पहुंचे। इस सम्मेलन में पूरे विश्व के प्रख्यात धर्मगुरुओं ने हिस्सा लिया तथा सभी ने अपने धर्म को प्रदर्शन करने वाली अपनी-अपनी धार्मिक पुस्तक वहां रखी और

भारत के धार्मिक वर्णन के लिए स्वामी विवेकानंद ने ‘प्रसिद्ध धार्मिक पुस्तक श्रीमद्भगवद्गीता’ रखी जिसका उस सम्मेलन में सभी ने काफी मजाक उड़ाया और विवेकानंद को नीचा दिखाने की पूरी कोशिश की विवेकानंद यह सब अपने नाम की तरह विवेकपूर्ण शांति से सुन रहे थे और सहन कर रहे थे (स्वामी विवेकानंद का शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन)

जब विवेकानंद को भाषण के लिए बुलाया गया तो उन्होंने अपने भारत की संस्कृति का प्रदर्शन करते हुए भाषण का प्रारंभ “मेरे प्यारे भाइयों और बहनों” से किया जिसे सुनते ही सभी ने तालियों की बौछार कर दी उनके इस संबोधन से सभागण इतने खुश हुए कि पूरे 2 मिनट तक तालियां बजती रहें

और उसके बाद विवेकानंद ने शांति पूर्ण जीवन यापन करने तथा वैदिक दर्शन की ज्ञान की बात की। उनका भाषण इतना प्रभावशाली रहा कि पूरे विश्व में भारतीय संस्कृति को जाना और पहचाना जाने लगा

विदेश भ्रमण

धर्म सम्मेलन खत्म होने के पश्चात वह अमेरिका में वेदांत की शिक्षा का 3 वर्षों तक प्रचार प्रसार करते रहे, उसी दौरान ‘Cylonic Monic From India’ नाम उन्हें अमेरिका की प्रेस ने दे दिया। इसके पश्चात 2 वर्षों तक न्यूयॉर्क शिकागो और कई जगहों पर भाषण दिए तथा न्यूयॉर्क में 1894 मे ‘वेदांत सोसाइटी’ की स्थापना भी की।

वे भाषण देने में काफी व्यस्त रहते तथा अपना पूर्ण ध्यान नहीं रख पाते और 1895 में उनकी तबीयत बिगड़ने लगी थी अतः उन्होंने भाषण देना कम कर योग संबंधित कक्षाएं देना प्रारंभ कर दिया और भगिनी निवेदिता उनकी प्रमुख शिष्यों की सूची में से एक थी। विवेकानंद के गुरु रामकृष्ण परमहंस की जीवनी लिखने वाले ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के मैक्स मूलर से 1896 में मुलाकात हुई

और इसके पश्चात वे 15 जनवरी 1897 को श्रीलंका गए जहां उनका काफी सम्मान पूर्वक स्वागत किया गया (स्वामी विवेकानंद की यात्रा) वहां से रामेश्वर होते हुए वे कोलकाता चले गए उनके हर भाषण में मेहनत तथा विकास की मुख्य भूमिका रहती तथा उन्हें सुनने के लिए हजारों लोग जमा हो जाया करते थे।

1899 को पुनः अमेरिका गए और अपनी दूसरी विदेश यात्रा की इस दौरान कैलिफोर्निया में शांति आश्रम तथा न्यूयॉर्क एवं सन फ्रांसिस्को में वेदांत सोसाइटी की स्थापना की 1900 में पेरिस जाकर “कांग्रेश ऑफ द हिस्ट्री रिलीजन” में शामिल हुए। कुछ समय पेरिस ही रहने के बाद वे भारत आए और वाराणसी तथा बोधगया की तीर्थ यात्रा की अब उनका स्वास्थ्य लगातार बिगड़ने लगा तथा डायबिटीज और अस्थमा जैसी बीमारियों की चपेट में वे भी आ गए।

रामकृष्ण मिशन की स्थापना

अपनी प्रथम विश्व यात्रा पूर्ण कर जब विवेकानंद जी भारत लौटे तब 1 मई 1897 को रामकृष्ण मिशन की स्थापना की ; इस मिशन का मुख्य उद्देश्य भारत के नवीन निर्माण के लिए स्कूल, कॉलेज, अस्पताल आदि जैसे और अन्य क्षेत्रों में आगे बढ़ना था। वेद तथा साहित्य के ज्ञाता, दर्शन एवं इतिहास के विद्वान,

भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने वाले स्वामी जी ने ऐसे उत्कृष्ट कार्य किए की वे युवा पीढ़ी के आदर्श बन गए। (स्वामी विवेकानंद का रामकृष्ण मिशन) भारतीय जीवन दर्शन को एक नया आयाम देने के लिए उन्होंने बेलूर मठ की 1898 को स्थापना की इसके अलावा विवेकानंद जी ने और दो मठों की स्थापना भी की है।

विवेकानंद जी की मृत्यु

स्वामी विवेकानंद के उच्च विचार, सादा जीवन, सांस्कृतिक अनुभव, आध्यात्मिक ज्ञान, दर्शन एवं इतिहास के ज्ञाता, वेदों के विद्वान, आदि सकारात्मक गुणों तथा विचारों से सभी प्रभावित होते हैं ; उन्होंने जीवन जीने की राह दिखाई तथा आगे बढ़ने की प्रेरणा दी है । वह दूरदर्शी सोच के व्यक्ति थे जिन्होंने पहले यह भविष्यवाणी कर रखी थी कि

वह 40 वर्ष की उम्र से ज्यादा नहीं जी पाएंगे और मात्र 39 वर्ष की उम्र में 4 जुलाई 1902 को उन्होंने महासमाधि ले ली। (स्वामी विवेकानंद की मृत्यु) मानव तथा जीव जंतु में दयालु दिखाने वाले प्रेम तथा भाईचारे से जीने की सीख देने वाले तथा महान सोच रखने वाले महापुरुष का अंतिम संस्कार पवित्र गंगा नदी के तट पर किया गया।

मुख्य तथ्य/पहलू

★ स्वामी जी का मानना था कि परोपकार की भावना हर व्यक्ति में होनी चाहिए यह समाज के उत्थान में सहायक है उनका कथन है कि “देने का आनंद लेने से बड़ा होता है।”

★ BA पूर्ण करने के बाद जब उन्हें लंबे समय तक नौकरी के लिए भटकना पड़ा और हर बार असफलता पाकर वे काफी निराश हो गए और नास्तिक बन गए।

★ भौतिकवादी सोच व्यक्ति को लालची बनाती हैं अतः स्वामी जी सादा जीवन जीते हैं और यही सिखाते भी है।

★ स्वामी विवेकानंद जी की याद में तथा उन्हें युवाओं से जोड़े रखने के लिए उनकी जन्म दिनांक 12 जनवरी को प्रतिवर्ष ‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ मनाया जाता है।

★ स्वामी जी का मानना था कि एक निश्चित लक्ष्य के निर्धारण से ही आप अपनी मंजिल प्राप्त कर सकते हैं अतः सफलता के लिए एक निश्चित लक्ष्य तो होना ही चाहिए। (swami vivekanand biography in 10 line)

★ स्वामी जी जो भी कार्य करते पूरी मेहनत और शिद्दत से करते और उनका मानना था कि ‘व्यक्ति का कर्तव्य निष्ठ होना ही उसे पहचान दिलाता है।’

★ गरीबी के दौरान जब घर में भोजन की कमी होती तो वह कई बार यह झूठ बोल लेते कि उन्हें बाहर से खाने का न्योता आया है, यह झूठ वे मजबूरी में ही बोलते ताकि उनके परिवार वाले भोजन कर सके।

★ उनकी सादगी का पता इस बात से चलता है कि उन्होंने लंदन में एक बार 1896 मे कचोरिया तक बनाई थी। (स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय)

★ स्वामी जी का मानना था कि जो व्यक्ति हार मानकर डर जाता है वह निश्चित रूप से असफल होता है तथा जो डटकर सामना करता है वह निश्चित रूप से सफल होता है तात्पर्य ‘डर से भागने की बजाय उसका डटकर सामना करना चाहिए’।

★ अंधश्रद्धा तथा कर्मकांड छोड़कर विवेक बुद्धि से धर्म का अभ्यास करने की बात पर जोर दिया।

★ स्वामी जी को खिचड़ी तथा चाय बहुत पसंद थी।

★ स्वामी जी पशु पक्षी तथा जानवरों से काफी लगाव रखते थे।

★ स्वामी जी अविवाहित थे।

★ शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में उनके संबोधन “मेरे प्यारे भाइयों और बहनों” ने सभी पर गहरा प्रभाव डाला और भारत की एक नई छवि सबके सामने रखी। (swami vivekanand Moral)

रचनाएं

कर्मयोग 1896, जनन योग 1899, काली- द मदर 1898, राजयोग 1896, inspired talks 1909, meditation and its method 1976, my master 1901, practical vedanta 1912, bartaman bharat 1899, to the youth of India 1954, (swami vivekanand autobiography)

ज्ञान योग , भक्ति योग, प्रेम योग, मैं कौन हूं , मेरा जीवन तथा ध्येय, आत्मानुभूति के खुले रहस्य, मन की शक्तियां तथा जीवन गठन की साधनाएं, work and its Secret, शक्तिदायी विचार आदि उनकी प्रमुख रचनाएं हैं। (स्वामी विवेकानंद की पुस्तक)

विवेकानंद का योगदान

बुद्धिजीवी एवं प्रतिभावान विचारों से सभी को मोहित करने वाले स्वामी विवेकानंद जी ने एक नए भारत को बनाने की सोची उसके लिए कई प्रयास भी किया उन्होंने कई मठ, अस्पताल, विद्यालय, महाविद्यालय, छात्रावास, आदि बनवाए तथा युवाओं को जीवन जीने व सदैव आगे बढ़ते रहने की सीख दी है। उनका कथन था कि “उठो, जागो, और तब तक मत रुको; जब तक लक्ष्य प्राप्त ना हो।” मित्रों स्वामी जी ने कई योगदान दिए हैं, जिनमें से हम प्रमुख योगदान के ऊपर दृष्टि डाल लेते हैं।

-: उन्होंने अपने दर्शन, वेद, ज्ञानसे मानव में धर्म की नई और विस्तृत समाज का विकास किया है।

-: एकता और भाईचारे का महत्व बताते हुए एक साथ रहने पर जोर दिया।

-: उन्होंने आचरण, व्यवहार के नए सिद्धांत दिए।

-: विवेकानंद जी की रचनाओं से भारतीय साहित्य को मजबूत करने में अहम योगदान है। (swami vivekanand biography in short)

-: भारत के प्रमुख धार्मिक रचनाओं का सही और सीधा अर्थ समझाया।

-: जातिवाद से दुखी होकर उन्होंने जातियों के महत्व को समझाने में अपना योगदान दिया, तथा नीची जातियों को भी समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का कार्य कर अपना अहम योगदान दिया।

-: लोगों को संस्कृति से जोड़ने का प्रयास किया।

-: पूर्व और पश्चिम देशों को आपस में जोड़ने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

FAQ

स्वामी विवेकानंद का वास्तविक नाम क्या है?

नरेंद्र नाथ दत्त

स्वामी विवेकानंद का जन्म कब व कहां हुआ?

12 जनवरी 1863 को पश्चिमी बंगाल कोलकाता में नरेंद्र नाथ दत्त का जन्म हुआ।

स्वामी विवेकानंद के माता पिता का नाम क्या है?

उनके पिता का नाम विश्वनाथ दत्त तथा माता का नाम भुवनेश्वरी देवी है।

स्वामी विवेकानंद के गुरु का नाम क्या है?

उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस जो की महाकाली के परम भक्त थे।

राष्ट्रीय युवा दिवस कब मनाया जाता है?

प्रतिवर्ष 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद के जन्म दिवस के दिन राष्ट्रीय युवा दिवस मनाया जाता है।

राष्ट्रीय युवा दिवस क्यो मनाया जाता है?

स्वामी विवेकानंद युवाओं से काफी आशा लगाए हुए थे तथा वे समस्त युवाओं के आदर्श व प्रेरणा स्त्रोत है इसीलिए प्रतिवर्ष इस महापुरुष के जन्मदिवस को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाते हैं।

स्वामी विवेकानंद की मृत्यु कब हुई?

39 वर्ष की उम्र में 4 जुलाई 1902 को युवाओं के आदर्श महापुरुष स्वामी विवेकानंद का देवलोक गमन हो गया।

स्वामी विवेकानंद का अंतिम संस्कार कहा किया गया?

पवित्र गंगा नदी के तट पर

रामकृष्ण मिशन के संस्थापक कौन है?

स्वामी विवेकानंद।

स्वामी विवेकानंद का प्रमुख कथन क्या है?

उठो , जागो और तब तक मत रुको; जब तक लक्ष्य प्राप्त ना हो।

तो दोस्तों आज हमने भारतीय दर्शन एवं साहित्य के विद्वान, वेदों के ज्ञाता, रामकृष्ण मिशन के संस्थापक स्वामी विवेकानंद जी के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त की है। विवेकानंद जी ने गरीबी मे जीवन यापन कर अपने संस्कारो तथा उच्च विचारों से प्रसिद्धि प्राप्त की है।

ये महापुरुष युवाओं के प्रेरणा स्त्रोत एवं आदर्श बन गए है उनकी जीवनी को सभी अपनाना चाहते है। हमें भी महान पुरुष, वेदांत ज्ञाता स्वामी विवेकानंद से बहुत कुछ सीखना चाहिए और अपने जीवन में परिवर्तन लाना चाहिए। तो दोस्तों आपको जीवनी केसी लगी कमेंट कर अवश्य बताए और लेख को शेयर करे।

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Tushar Shrimali Jivani jano के लिए Content लिखते हैं। इन्हें इतिहास और लोगों की जीवनी (Biography) जानने का शौक हैं। इसलिए लोगों की जीवनी से जुड़ी जानकारी यहाँ शेयर करते हैं।

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